पत्रकारिता के नोबेल पुरस्कार नाम से जाने जाने वाले पुलित्ज़र पुरस्कार के जनक जोजेफ पुलित्ज़र थे। उनका जन्म 10 अप्रैल 1847 को हंगरी में हुआ था।
अपने भविष्य से बेखबर पुलित्ज़र युवावस्था में अमेरिका आकर वहाँ की सेना में 1869 में भर्ती हो गए। पर अधिक समय तक वहाँ नहीं टिक पाये। बाद में उन्होंने जर्मनी के एक प्रमुख अख़बार ‘वेस्टलिशे पोस्ट’ में काम करना शुरू किया। अपने जुझारू एवं कर्मठ व्यक्तित्व के कारण पुलित्ज़र आगे चलकर वेस्टलिशे पोस्ट के हिस्सेदार भी बन गए।
पुलित्ज़र ने 19वीं सदी में ही ख़ोजी पत्रकारिता के महत्त्व पहचाना। उन्होंने अपनी खोजी पत्रकारिता का निशाना, सरकारी भ्रष्टाचारियों, टैक्स चोरी करने वाले लोगों एवं जुएबाजों आदि को बनाया। वे पत्रकारिता के महत्त्व को काफी अच्छी तरह समझते थे। एक बार उन्होंने कहा था कि अमेरिका का भविष्य गढ़ने की शक्ति पत्रकारों के भावी पीढ़ियों के हाथों में है।
मात्र 25 वर्ष की आयु में ही पुलित्ज़र एक प्रकाशक बन गए जिसके बाद बिज़नेस संबंधी सुझबुझ एवं दूरदर्शिता दिखाते हुए 1878 में ‘सेंट लुइस पोस्ट डिस्पैच’ के मालिक बन गए। इससे उनकी छवि जर्नलिस्ट एवं उद्यमी दोनों के रूप में निखर कर सामने आई। अब लोग उनकों काफी संजीदगी से लेने लगे।अब तक अमेरिका में रह रहे पुलित्ज़र पूर्ण अमेरिकी हो चुके थे। पर एक लक्ष्य को लेकर जुनून की हद तक मेहनत करने वाले पुलित्ज़र को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। उनकी आँखे कमजोर हो गयीं। वे बीमार बड़ गए। डाॅक्टरों ने उन्हें छुट्टी पर जाने की सलाह दी। पर स्टीमर से सैर पर जाने की बजाए उन्होंने जे गोल्ड नामक फायनेंसर से ‘दि न्यूयाॅर्कवर्ल्ड ’ नामक अख़बार को खरीदने की बात की। यह अख़बार उस समय आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। धुन के पक्के पुलित्जर ने इस अख़बार को भी वेस्टलीशे पोस्ट की तर्ज पर पुनः खड़ा कर दिया। यह बहुत बड़ी जीत थी। कुछ ही दिनों में ‘दि वर्ल्ड की बिक्री छः लाख प्रातियों तक पहुँच गयी और वह सबसे अधिक बिकने वाला अख़बार बन गया। इस अप्रत्याशित सपफलता से उनके कई दुश्मन भी बने।
तेजी से गिरते स्वास्थ्य एवं बढ़ते दबाव के कारण पुलित्ज़र ने 43 वर्ष की अवस्था में दि वर्ल्ड के संपादक पद को हमेशा के लिए छोड़ दिया। स्पेन के विरुद्ध ( क्यूबाई विद्रोह के समय) पुलित्ज़र के ऊपर कुछ लोगों ने ‘येलो जर्नलिज़्म’ का इल्जाम भी लगाया, पर बिना विचलित हुए वे संयत तरीके अपने संपादकीय के द्वारा प्रहार करते रहे। एक अवसर ऐसा भी आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट को भी उनके आगे झुकना पड़ा।जीवन का आखिरी कुछ समय पुलित्जर के लिए काफी कष्टपूर्ण बीता। इनकी आँखों की रौशनी चली गई। किसी भी तरह की आवाज़ से इन्हें एलर्जी होने लगी। कानों में असह्य पीड़ा के कारण ये शान्ति की ख़ोज में एकांत में चले गए। वहाँ से भी ये कोड्स के माध्यम से अपने संपादकीय भेजते रहे। इसके लिए पुलित्जर ने कुल 20,000 कोड इजाद किया। ऐसे समर्पित पत्रकार पुलित्ज़र का कोलंबिया स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म की स्थापना करवाने के बाद 1912 में देहान्त हो गया। यह अपने पीछे पत्रकारिता के सबसे अमूल्य पुरस्कार को छोड़ गए जो 1917 से प्रतिवर्ष इन्ही के नाम पर पत्रकारिता, इतिहास, कथा, साहित्य, काब्य, जीवनी, आत्मकथा, नाटक और संगीत की कुल 21 श्रेणियों में दिए जाते हैं। इस प्रकार इस पुरस्कार के माध्यम से ही पुलित्ज़र आज भी हमारे बीच हैं ।
अपने भविष्य से बेखबर पुलित्ज़र युवावस्था में अमेरिका आकर वहाँ की सेना में 1869 में भर्ती हो गए। पर अधिक समय तक वहाँ नहीं टिक पाये। बाद में उन्होंने जर्मनी के एक प्रमुख अख़बार ‘वेस्टलिशे पोस्ट’ में काम करना शुरू किया। अपने जुझारू एवं कर्मठ व्यक्तित्व के कारण पुलित्ज़र आगे चलकर वेस्टलिशे पोस्ट के हिस्सेदार भी बन गए।
पुलित्ज़र ने 19वीं सदी में ही ख़ोजी पत्रकारिता के महत्त्व पहचाना। उन्होंने अपनी खोजी पत्रकारिता का निशाना, सरकारी भ्रष्टाचारियों, टैक्स चोरी करने वाले लोगों एवं जुएबाजों आदि को बनाया। वे पत्रकारिता के महत्त्व को काफी अच्छी तरह समझते थे। एक बार उन्होंने कहा था कि अमेरिका का भविष्य गढ़ने की शक्ति पत्रकारों के भावी पीढ़ियों के हाथों में है।
मात्र 25 वर्ष की आयु में ही पुलित्ज़र एक प्रकाशक बन गए जिसके बाद बिज़नेस संबंधी सुझबुझ एवं दूरदर्शिता दिखाते हुए 1878 में ‘सेंट लुइस पोस्ट डिस्पैच’ के मालिक बन गए। इससे उनकी छवि जर्नलिस्ट एवं उद्यमी दोनों के रूप में निखर कर सामने आई। अब लोग उनकों काफी संजीदगी से लेने लगे।अब तक अमेरिका में रह रहे पुलित्ज़र पूर्ण अमेरिकी हो चुके थे। पर एक लक्ष्य को लेकर जुनून की हद तक मेहनत करने वाले पुलित्ज़र को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। उनकी आँखे कमजोर हो गयीं। वे बीमार बड़ गए। डाॅक्टरों ने उन्हें छुट्टी पर जाने की सलाह दी। पर स्टीमर से सैर पर जाने की बजाए उन्होंने जे गोल्ड नामक फायनेंसर से ‘दि न्यूयाॅर्कवर्ल्ड ’ नामक अख़बार को खरीदने की बात की। यह अख़बार उस समय आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। धुन के पक्के पुलित्जर ने इस अख़बार को भी वेस्टलीशे पोस्ट की तर्ज पर पुनः खड़ा कर दिया। यह बहुत बड़ी जीत थी। कुछ ही दिनों में ‘दि वर्ल्ड की बिक्री छः लाख प्रातियों तक पहुँच गयी और वह सबसे अधिक बिकने वाला अख़बार बन गया। इस अप्रत्याशित सपफलता से उनके कई दुश्मन भी बने।
तेजी से गिरते स्वास्थ्य एवं बढ़ते दबाव के कारण पुलित्ज़र ने 43 वर्ष की अवस्था में दि वर्ल्ड के संपादक पद को हमेशा के लिए छोड़ दिया। स्पेन के विरुद्ध ( क्यूबाई विद्रोह के समय) पुलित्ज़र के ऊपर कुछ लोगों ने ‘येलो जर्नलिज़्म’ का इल्जाम भी लगाया, पर बिना विचलित हुए वे संयत तरीके अपने संपादकीय के द्वारा प्रहार करते रहे। एक अवसर ऐसा भी आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट को भी उनके आगे झुकना पड़ा।जीवन का आखिरी कुछ समय पुलित्जर के लिए काफी कष्टपूर्ण बीता। इनकी आँखों की रौशनी चली गई। किसी भी तरह की आवाज़ से इन्हें एलर्जी होने लगी। कानों में असह्य पीड़ा के कारण ये शान्ति की ख़ोज में एकांत में चले गए। वहाँ से भी ये कोड्स के माध्यम से अपने संपादकीय भेजते रहे। इसके लिए पुलित्जर ने कुल 20,000 कोड इजाद किया। ऐसे समर्पित पत्रकार पुलित्ज़र का कोलंबिया स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म की स्थापना करवाने के बाद 1912 में देहान्त हो गया। यह अपने पीछे पत्रकारिता के सबसे अमूल्य पुरस्कार को छोड़ गए जो 1917 से प्रतिवर्ष इन्ही के नाम पर पत्रकारिता, इतिहास, कथा, साहित्य, काब्य, जीवनी, आत्मकथा, नाटक और संगीत की कुल 21 श्रेणियों में दिए जाते हैं। इस प्रकार इस पुरस्कार के माध्यम से ही पुलित्ज़र आज भी हमारे बीच हैं ।
